“Books are everywhere; and always the same sense of adventure fills us. Second-hand books are wild books, homeless books; they have come together in vast flocks of variegated feather, and have a charm which the domesticated volumes of the library lack. Besides, in this random miscellaneous company we may rub against some complete stranger who will, with luck, turn into the best friend we have in the world.” ― Virginia Woolf, Street Haunting
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Monday, October 25, 2010
सपनें..!! - 2
आज मेरी आँखों में नींद है पर मन में नहीं,
कुछ ऐसे ख़्यालों को बुन लिया है मैंने जिन्हें
कागज़ पर उतारने का मज़ा आ रहा है;
इसी आनंद की अनुभूति रोक लेती है
बिस्तर पर गिर जाने और आँखे मूँद लेने से,
प्यारी नींद लेने से और सपनें देखने से,
क्योंकि..
जागती आँखों के सपनें, सोई आँखों के सपनों से
अधिक प्यारे, ख़ूबसूरत और यादगार होते है;
बढ़ाते है उम्मीद और ख़ुशी,
और बनते है जीने का सहारा !! :-)
Image coustesy for both poems (सपने..!! - 1, सपनें..!! - 2) - Google Search.
Tuesday, August 24, 2010
मेरा भैया
अब जब ब्लॉग्गिंग स्टार्ट कर दी है और सभी की विशेष अवसरों पर लिखी गयी पोस्ट्स पढ़ती हूँ तो आज मेरा भी मन किया कि रक्षाबंधन के इस सुन्दर अवसर पर मैं भी अपने भाई के लिए कुछ लिखूं और आप सब के साथ उसे बांटू. तो पहले अपने भाई के बारें में बता दूं. ये छोटा सा बच्चा दिसम्बर में नौ साल का हो जायेगा और बच्चो के लिए प्रयोग किये जाने बाले सभी मासूम, भोला, नटखट, शरारती, जिद्दी, बुद्धू आदि विशेषण उसके लिए उपयुक्त है. परन्तु आज के आधुनिक युग के अति चतुर बच्चों कि तुलना में ये थोड़ा सा कम शरारती, कम चतुर और कम जिद्दी( यदि आप इसे प्यार से समझा सकें तो अन्यथा डांट से ये रुआंसा और बहुत ही मासूम हो जाता है और आपके दिल पिंघल जायेगा), थोड़ा अधिक समझदार और भावुक ( जो कभी कभी मुझे लगता है इसे नहीं होना चाहिए ) है.
लेकिन यदि मेरे भाई कि आधुनिकता कि बात करें तो इसकी तो हद ही है. आपने पिता के लिए प्रयुक्त होने वाले देसी शब्द 'बापू' से लेकर हिंदी शब्द 'पिताजी' फिर अंग्रेजी शब्द 'पापा', 'डेडी', 'डैड' और फिर डेविड धवन व उनके ही जैसे कुछ अन्य निर्देशकों की फिल्मों में प्रयुक्त इन शब्दों से बिगड़े हुए व भद्दे से लगने वाले शब्दों 'दैडा', 'पॉप', 'पॉप्स' आदि को तो सुना ही होगा. परन्तु मेरे अति आधुनिक भाई ने 'पापा' शब्द को बिगड़ कर 'पप्पू' ही कर दिया. मैं अचम्भे में थी जब उसने मुझसे आकर पूछा था कि ' पप्पू कहाँ है?' और मैं बहुत देर तक हँसी थी जब मुझे समझ आया था कि ये पप्पू है कौन. परन्तु शुक्र है कि वो जल्दी ही इसे भूल गया और इस तरह अलग और उलटे-पुल्टे नाम देना और भूल जाना इन महाशय की आदत है.
इस आठ साल के महान बच्चे का अपने रूप एवं साज-सज्जा की तरफ भी विशेष ध्यान है. नहाने के बाद कम से कम आधा घंटा इन्हें सजने संवरने में लगता है. इन्हें अपने सर में ख़ास ठंडा ठंडा कूल कूल नवरत्न तेल व बॉडी पर तेल, पाउडर लगाना ही है. फिर नए कपड़े पहनने है, शर्ट को निक्कर में दबा कर ही पहनना है. बैल्ट के बिना तो शो ही नहीं आती है. चहरे पर क्रीम भी लगानी है और बाल भी सैट करने है जो खुद से कभी ठीक से नहीं बना पाते है. इन्हें पॉकेट पर्स, और कलाई घड़ी का ख़ास शौक है. और हाँ शर्ट में पेन तो मैं भूल ही गयी. मतलब कि अपने आप में फुल फ़िल्मी हीरो और अपने बहनों के लिए कार्टून, मम्मी पापा का तो लाडला है ही.
मेरे भाई को हमें चिढाने में और हम बहनों को इसे चिढाने में कुछ ख़ास ही मज़ा आता है. पुराने फ़िल्मी स्वतंत्रता दिवस व रक्षाबंधन जैसे मौको पर सम्बंधित हिंदी फ़िल्मी गीतों को सुनना मुझे हमेशा से ही अच्छा लगता है. ये शौक दूरदर्शन की 'रंगोली' से शुरू हुआ और रेडियो, अन्य टीवी चैनल्स और कंप्यूटर तक अब भी जारी है.यही गीत विशेष कर अक्ष बंधन पर मेरे भाई को चिढाने और उसके मज़े लेने में मेरी काफी मदद करते है. जिनमे कुछ ख़ास है:-
'फूलों का तारों का सबका कहना है'
'भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना, भैया मेरे छोटी बहन को न भूलना ( जहाँ ' छोटी' को बदल कर मैं 'बड़ी' कर देती हूँ )
'इसे समझो न रेशम का तार भैया'
इन गानों को सुनकर उसके चहरे पर आने वाले मिले जुले भावों को देखना हमें बड़ा अच्छा लगता है. ये एकदम गिरगिट की तरह रंग बदलते है. पहले तो वो ध्यान नहीं देगा, फिर अन्दर ही अंदर थोड़ा सा हंसेगा और शर्मायेगा, फिर शरारत पर उतर आएगा और मेरी आवाज़ गीत के बोल से बदल कर 'अच्छा अच्छा सॉरी सॉरी' में बदल जाती है.
ये सब सुनहरी यादें है और आप भी अपने भाई या बहन को कुछ ऐसे ही गीत सुनाकर देखिएगा, एक अलग ही अनुभव है. और हाँ याद रहे सिर्फ अपने ही भाई बहनों को.. ;)
P.S. - इन तीनों गीतों के लिंक्स है:-
चित्र साभार - गूगल
P.S. - इन तीनों गीतों के लिंक्स है:-
- (http://www.songs.pk/indian/hare_rama_hare_krishna_1971.html)
- (http://www.youtube.com/watch?v=ItCxB6tRXJM)
- (http://www.bomb-mp3.com/download.php?mp3_id=6035769&title=Tirangaa+-+Ise+Samjho+Na+Reshma+Ka+Taar+-+www.Songs.PK)
चित्र साभार - गूगल
Sunday, August 1, 2010
इंतज़ार की घड़ियाँ
देख कर हमें वो प्यार से थे मुस्कुराए,
ये वहम था हमारा या उनकी अदाएँ!!
खुशबु से महकी थी रंगीन बगिया,
फूल ही थे यें या थी भवरों की सदाएँ!!
आह! ये कैसी हुई आहट!
वो आ गए है या ये उनके आने की है चाहत!!
आया है सीली सी हवा का झोंका,
बरसा है कहीं बादल या है ये आंसू भरी दुआएँ!!
Image courtesy - Image is a result of googling.
Monday, July 12, 2010
फूल,तितलियाँ,परियाँ और इन्द्रधनुष
आज फिर से इस मन ने कुछ कहा,
क्यों न किया जाए कुछ प्यारा प्यारा, कुछ नया;
आसमाँ में खिलाएं फूल महकते हुए,
बादलों में तितलियाँ हो चहकते हुए;
फूलों के रंगों में खो जाए इन्द्रधनुष,
डर कर 'न हो जाए गुम ही!',
क्यों न किया जाए कुछ प्यारा प्यारा, कुछ नया;
आसमाँ में खिलाएं फूल महकते हुए,
बादलों में तितलियाँ हो चहकते हुए;
फूलों के रंगों में खो जाए इन्द्रधनुष,
डर कर 'न हो जाए गुम ही!',
भाग आयें ज़मीं पर फैल जाएँ सब और;
रंगीं ज़मीं पर खड़े हो हम निहारें आसमाँ,
एक नया ही इन्द्रधनुष फूल बनाते हों वहां,
सात रंगों से भी ज्यादा रंग बिखरे हों जहाँ;
तितलियाँ वहां की परी हों और,
परियां ज़मीं की तितलियाँ !!
Thursday, June 10, 2010
लिखें कैसे!
लिखना चाहतें है कविता,
पर लिखें कैसे!
उलझी है विचारों की संहिता,
हम लिखें कैसे!
कशमकश में हूँ मैं,
किस पर लिखूं कविता?
तूफ़ान है दिल में कई,
क्या उन्हें उड़ेल दूँ!
कि खुशबुएँ हैं जो यहाँ,
उन्हें बयार दूँ!
ख़्वाबों को सजाऊँ,
कि यादों को बताऊँ;
हो रहे है जो जुदा,
मैं उनको बहलाऊँ;
जो प्यार है, जो सार है,
उस रब को मैं गाऊँ!
सब कुछ समाया है इसी में,
सब कुछ समाया है यहाँ;
तो रब ही है कविता,
रब को बताएँ कैसे!
लिखना चाहतें है कविता,
पर लिखें कैसे!
Wednesday, May 19, 2010
काश!!!

हरी प्रसाद - रमेश जी, आपका बेटा तो उन लोगों को पसंद है। अब आप उनके विषय में जो जानना चाहते हैं पता कर ले व लड़की भी देख लें। रुपये पैसे की बात तो हमारी पहले ही हो चुकी है।
रमेश - हाँ हरी प्रसाद जी, बात तो हो चुकी है परन्तु हम चार नहीं छह में रिश्ता करेंगे।
हरी प्रसाद - परन्तु पहले तो आप ही ने चार में हाँ कही थी, तभी तो उन्होंने आगे कदम बढाया है।
रमेश - हाँ, परन्तु अब बात और है।
हरी प्रसाद - मेरे विचार से आप अधिक मांग कर रहे है, वो इन्कार करेंगे, फिर भी मैं एक बार उनसे बात कर लूँगा।
हरी प्रसाद ने लड़की के पिता मोहन से बात की परन्तु उन्होंने अधिक धन देने से मना कर दिया और रिश्ता नहीं बना। चूँकि मोहन रिश्ते के सिलसिले में रमेश से एक बार मिल चुके थे इसलिए वो अब एकदूसरे को पहचानते थे और कुछ ही दूरी पर घर होने के कारण अक्सर मिल जाया करते थे। इसी तरह एक दिन रमेश कहीं जाते समय मोहन से मिले व रुक कर कुछ देर बातें करने लगे। रमेश के पड़ोस ही में एक लड़का शिव रहता था जिसके लिए रिश्ते की खोज की जा रही थी। शिव व उसके परिवार को रमेश अपने से थोड़ा कमतर मानते थे और इन लोगों की मांग भी कम थी इसलिए रमेश ने इस रिश्ते का जिक्र रमेश ने मोहन से किया। दोनों परिवारों ने एक दूसरे को देखा जाना, लड़का लड़की से मिला और रिश्ता पक्का हो गया। सगाई के बाद से ही लड़के का परिवार लड़की की सुन्दरता व गुणों की तारीफ़ करता और रमेश जी को आभार व्यक्त करता। विवाह के दिन रमेश का परिवार भी गर्व के साथ विवाह में शामिल हुआ। परन्तु दुल्हन को देख कर रमेश व उनके बेटे रोहित की आँखें खुली की खुली रह गयी। मंद मंद मुस्काती अत्यंत खुबसूरत दुल्हन दुल्हे शिव को वरमाला पहना रही थी और इधर रोहित अफ़सोस कर रहा था, " काश! पापा ने अधिक पैसों की मांग न की होती। काश! हमने पहले लड़की को देखा होता और काश! की मैंने पापा से कहा होता की मैं धन के आधार पर नहीं बल्कि सुन्दर व गुनी लड़की से शादी करूँगा।"
उसी समय रमेश का परिवार नवविवाहित जोड़े को बधाई देने के लिए गए और शिव ने दुल्हन को अपने पडोसी दोस्त रोहित से परिचित करवाया। रोहित का चेहरा उतर गया था जब दुल्हन ने कहा, "नमस्ते भैया ..."।
Saturday, May 8, 2010
गद गद हो गई

एक दिन अध्यापक ने सभी विद्यार्थियों को कहा - 'गद गद होना' इस मुहावरे का वाक्य बनाओ।
अध्यापक ने गोलु से पूछा तो उसने बताया -'सालों बाद बेटे को देखकर माँ गद गद हो गई'।
अध्यापक ने गोलु से पूछा तो उसने बताया -'सालों बाद बेटे को देखकर माँ गद गद हो गई'।
गोलु के नकलची मोलु ने पड़ते ही कहा, 'नहीं... !! बेटे को देखते ही माँ पैड़ियों में गद गद* हो गई।'
.
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.
* गद से गिरना ( जोर से गिरना)
पीएस नोट - तस्वीर इन्टरनेट से ली गई एक क्लिप आर्ट है।
Thursday, May 6, 2010
चक्र

गर्मियों की भरी दोपहरी में,
आसमां में सूरज जब तमतमाया,
खुद भी जला, औरों को भी जलाया;
तारों से चमकने की होड़ में तो जीत गया वो,
पर किसी और को फूटी आँख ना सुहाया;
न किसी ने उसे देखा,
न ही कोई आसमां में देख पाया;
छा गया एक सूनापन आसमां में,
और जब टकराया ये सूनापन,
दिलों में भरी पीड़ा और सूनेपन से;
तो गिरने लगा सूरज,
टूटने लगा सारा दंभ और अभिमान;
रात भर के प्रायश्चित के बाद,
एक बार फिर सूरज जगमगाया,
नई ताजगी के साथ,
और ये चक्र दोहराता है बार बार।
पीएस. नोट - तस्वीर http://www.swpc.noaa.gov/primer/primer_graphics/Sun.pसे ली गई है।
Wednesday, April 21, 2010
ओ तेज ठंडी हवा
ओ तेज ठंडी हवा
खनखनाती है मेरी विंड चाईम
सुहाती है मुझे
आ थोड़ा और पास आ
ओ तेज ठंडी हवा
लाती है बूंदों भरे बादल
भिगाती है मुझे
आ थोड़ा और पास आ
ओ तेज ठंडी हवा
आती है धूल से भर कर
सताती है मुझे
रुक, थोड़ा ठहर जा
ओ तेज ठंडी हवा
गुनगुनाता है दूर कोई प्यार के गीत
सुनाती है मुझे
आ थोड़ा फिर पास आ
थोड़ा.. और पास आ
खनखनाती है मेरी विंड चाईम
सुहाती है मुझे
आ थोड़ा और पास आ
ओ तेज ठंडी हवा
लाती है बूंदों भरे बादल
भिगाती है मुझे
आ थोड़ा और पास आ
ओ तेज ठंडी हवा
आती है धूल से भर कर
सताती है मुझे
रुक, थोड़ा ठहर जा
ओ तेज ठंडी हवा
गुनगुनाता है दूर कोई प्यार के गीत
सुनाती है मुझे
आ थोड़ा फिर पास आ
थोड़ा.. और पास आ
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